पीहू ने जैसे ही अपनी आँखें खोलीं, उसने सामने खड़े दोनों भाइयों की आँखों में अपने लिए सुलगती हुई बेकाबू दीवानगी को देखा। कमरे का तापमान जैसे एक झटके में बढ़ गया था। विश्व और मृत्युंजय, दोनों की नज़रें एक पल के लिए भी उसकी क्लीवेज और उन भारी उभारों से नहीं हट रही थीं, जो उसकी तेज़ चलती सांसों के साथ लगातार ऊपर-नीचे हो रहे थे।
मृत्युंजय ने एक कदम और आगे बढ़ाया, जिससे उसकी गर्म और भारी सांसें सीधे पीहू के खुले गले और वक्ष पर महसूस होने लगीं। इस बेहद नज़दीकी ने पीहू के पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर दी। वह चाहकर भी अपनी नज़रें फेर नहीं पा रही थी। विश्व ने उसके होठों पर रखे अपने अंगूठे के दबाव को थोड़ा और बढ़ाया, जिससे उसका निचला होंठ हल्का सा दब गया।




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