पायल की छनकती हुई आवाज के साथ ही बालकनी का माहौल पूरी तरह बदल गया था। वैराग्य के साथ शांति भी अंदर आ चुकी थी। सत्यजीत अपनी ठंडी और गहरी निगाहों से धैर्य की तरफ देख रहा था, जिसके चेहरे पर अभी भी हल्की सी परेशानी और हवस की लकीरें साफ झलक रही थीं। जैसे ही संवि ने मुड़कर देखा, वह झिझकते हुए सत्यजीत के ठीक बगल में आकर बैठ गई, और वैराग्य भी अपनी मस्त चाल में चलकर पास ही रखी एक सिंगल चेयर पर आराम से टाँग पर टाँग रखकर बैठ गया।
सत्यजीत ने अपनी उंगलियों के बीच दबी जलती हुई सिगरेट को एक तरफ ऐशट्रेल में मसलकर फेंक दिया। संवि अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही सत्यजीत ने अपनी मजबूत और गर्म हथेलियों से उसकी पतली कमर को कसकर पकड़ा और एक ही झटके में उसे खींचकर सीधे अपनी गोद में बैठा लिया।




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